तारा तंत्र भाग -२









चिनाचार क्या है ?
मां भगवती तारा महाविद्या के आचार को चिनाचार कहा जाता है
चीनाचार के उपदेशक भगवान बुद्ध को लोग मानते हैं
किंतु यहां बुद्ध शब्द बुद्धिवादी ज्ञानियों के लिए उपयोग हुआ है जो भगवान शिव का एक रूप है 
चीन आचार का अर्थ कुछ लोग यह निकालते हैं कि चीन देश से आया हुआ आचार चीनाचार  है
परंतु यह गलत जानकारी है चीनाचार का वास्तविक अर्थ है प्राचीन आचार या चीनाचार में देशकाल
परिस्थितियों का कोई विचार नहीं किया जाता है वर्ण वर्ण जाति कुल इत्यादि का भी कोई विचार नहीं किया जाता है
कभी भी साधना की जा सकती है खान-पान आदि में भी कोई विशेष निषेध नहीं है ऐसे ही आचरण को चीनाचार कहते हैं
चीनाचार क्रम में स्नान ,शौच, पूजन , तर्पण आदि क्रियाएं मानसिक ही मानी जाती है
जब समय होगा मन प्रसन्न हो तभी पूजन करना चाहिए भोजन करके बिना स्नान किए किसी भी समय
तारा देवी का भजन करें स्त्रियों में द्वेष ना करें और एकांत में बलि आदि देवें पूजन के स्थान पर महाशंख
अवश्य स्थापित करें तथा स्त्री  से संभोग आदि क्रियाएं करते हुए जप करें उनके द्वारा उच्छिष्ट मदिरा का पान
अवश्य करें चलते-फिरते खाते-पीते किसी भी समय किसी भी दिशा में जप करें स्वेच्छाचार ही तारा तंत्र में प्रशस्त है
जब भी स्त्री को देखें तो उनको मानसिक रूप से प्रणाम करें स्त्रियों की निंदा और उनके लिए कभी भी
गलत शब्दों का प्रयोग ना करें चीनाचार में  स्त्रियां ही प्राण है वही आभूषण है और
वही साधक की सर्वेसर्वा है चीनाचार के साधक को स्त्रियों की रक्षा अवश्य करनी चाहिए 
व्यर्थ में  वीर्य पतन करना व्यर्थ में मदिरापान करना चीनाचार क्रम में अनुचित माना गया है
उत्तेजनावश स्त्री से संभोग करना यह साधक के नहीं पशु के गुण हैं और
पशुओं को इस मार्ग से दूर ही रहना चाहिए .

माँ तारा की साधना में चिनाचार का विशेष महत्त्व है

दक्षिणाचार्य और वामाचार्य क्या है ?

  शाक्त मत के मुख्या  दो मार्ग है 

  1. दक्षिणाचार्य ( दक्षिण मार्ग )
  2. वामाचार्य    (  वाम मार्ग )

दक्षिणाचार्य ( दक्षिण मार्ग ) -  दक्षिण मार्ग में विधि विधान का अधिक प्रचलन है दक्षिण मार्ग में सामाजिक परंपराओं और विधियों का पालन करते हुए
जब तप - पूजा - पाठ - संध्या आदि दक्षिण मार्ग  में आते हैं इस मार्ग में जातिगत भेद वर्णाश्रम व्यवस्था
के अतिरिक्त देश काल एवं परिस्थितियों का पूरा ध्यान रखा जाता है
इसी कारण यह दक्षिण मार्ग कहलाता है इस मार्ग को दक्षिण मूर्ति ने उद्घाटित किया था

वामाचार्य ( वाम मार्ग ) - शाक्त मार्ग का दूसरा मार्ग वाम मार्ग है वाम मार्ग का अर्थ प्रतिकूल आचरण ही 
वाम मार्ग है वाम मार्ग में उन चीजों का प्रयोग किया जाता है जिनको  सभ्य समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं है
वाम मार्ग में पंच मकार द्वारा रात्रि में माँ भगवती का पूजा जप आदि का विशेष विधान है
पंच मकार में मांस - मदिरा -मीन - मैथुन का  प्रयोग किया जाता है
इसमें अस्थि माला ,यह रुद्राक्ष की माला धारण करनी होती है
इससे साधक के भावों में जागृति आ जाती है साधक के अंदर साक्षी भाव का उदय हो जाता है
वह सभी वस्तुओं और जीवो में सम दृष्टि रखता है 

साधना मार्ग में तीन भाव मुख्य है

 पशु भाव - इंद्रियों के वशीभूत होकर अपनी कामनाओं की पूर्ति और सुख के लिए प्रयास करने वाले
  मनुष्य को पशु कहते हैं और इस भाव को पशु भाव कहा जाता है

 वीर भाव- इंद्रियों की आशक्ति को त्याग करके अपने जीवन के मूल उद्देश्य की प्राप्ति के लिए
भय मुक्त होकर इष्ट की प्राप्ति के लिए प्रयास करने वाला वीर कहलाता है और
इस भाव को वीर भाव कहा जाता है इसमें शाक्त  मार्ग के साधक आते हैं

 दिव्य भाव- दिव्य भाव सभी भाव में परम भाव है इस भाव को प्राप्त साधक स्वयं  शिव समान होता है
जो इस सृष्टि को समद्रष्टि से देखता है स्थिर रहता है और सदा ध्यान में रहता है
इसको शिवोहम अवस्था भी कहा जा सकता है . 



जिसकी जितनी बुद्धि होती है वह उतना ही समझने का प्रयास करता है
यह विषय श्रद्धा और समर्पण और  विश्वास का है तर्क वितर्क से इसका कोई संबंध नहीं है
इसलिए अपने विवेक का प्रयोग करें


।। अथ प्रातः कृत्यम् ।।


सर्वप्रथम साधक उठकर गुरु को प्रणाम करें। मानसिक रूप से गुरु का पंचोपचार पूजन करें। सर्वप्रथम ध्यान करें

नीलाम्बरं नीलविलेपयुक्तं शंखादिभूषिततर्नु मुदितं त्रिनेत्रम्। वामांक-पीठस्थितं-नीलशक्ति वन्दामिवीरं करुणानिथानम्।।
मानसोपचार :
लं पृथिव्यात्मकं गन्धं ऐं श्रीं अमुकानन्दनाथ अमुकी देव्यम्बा -
-पादुकां समर्पयामि नमः                                 - कनिष्ठा अँगूठे से 
हं आकाशात्मकं पुष्पं                                    - तर्जनी अंगूठा से 
वं वाय्यवात्मकं पुष्पं                                       - मध्यमा अनामिकाअँगूठा से  
रं तेजसात्मक दीपं                                        - मध्यमा अगूंठा से 
वं अमृतात्मकं नैवेद्यं                                      - अनामिका अँगूठे से 
सं सर्वात्मकं ताम्बूलं                                        - सर्व अँगुलियों से

तत्पश्चात् हृदय से तारा देवी का इस प्रकार ध्यान करें -

खर्वां नीलां विशालाक्षीं पंचमुद्रां विभूषिताम् । कपालकर्तृकाहस्तां खगेन्दीवर-धारिणीम् ।।
व्यालमाला जटाजूटां पीनोन्नत-पयोधराम्। नवयौवन-सम्पूर्णां मदापूर्णित-लोचनाम् ।।



ध्यान करने के पश्चात् साधक अजपा जप का संकल्प करें
निम्नानुसार करें -
ॐ अस्य श्री अजपा मन्त्रस्य हंस ऋषिः अव्यक्ता गायत्री बन्दः परमात्मा देवता है बीज सः शक्तिः सोऽहं कीलकं मोक्षार्थे जपे विनियोगः कहकर जल छोड़
पश्चात् ध्यान करें।

अग्नीसोमगुरु-द्वयं प्रणवकं बिन्दूत्रिनेत्रोज्ज्वलम् । भास्वद्रूपमुखं शिवांघ्रि-युगलं पार्श्वस्थ-सूर्यानलम् ।। उद्यद्भास्कर-कोटि-कोटि-सदृशं हंसं जगद्व्यापिनीम् । शब्दं ब्रह्ममयं हृदयम्बुजपरे नीडे सदासंस्मरेत् ।।

प्रकार उचित हैं जैसी गुरु परंपरा हो उसी के उसी के अनुसार करना चाहिये।

माँ तारा को जप समर्पण करने के पश्चात् गुरु मंत्र का एकाक्षरी मंत्र जाप सामर्थ्य के अनुसार करें।

                    प्रातः कृत्य गुरुक्रम निम्न प्रकार से है -
१. ऐं
२. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं हसखफ्रें हसक्षमलवरयूं सहखफ्रें सहक्षमलवरयीं हंसः सोऽहं हसौः सहौ:  
३. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं हसखः हसक्षमलवरयूं सहखफ्रें सहक्षमलवरयीं हंसः सोऽहं स्वाहा 
 ४. ॐ जूं सः कालमूर्ति काल प्रबोधिनि कालातीते कालदायिनि कपालपात्र धारिणि अमरी कुण्डलिनि जूं सः वं वं वं हंसः सोऽहं स्वाहा
५. ॐ ह्रीं जूं सः कालमूर्ति काल प्रबोधिनि कालातीते कालदायिनि कपालपात्र धारिणि मारणि कुण्डलिनि जूं सः वं सोऽहं हंसः स्वाहा ।



जय माँ तारणी

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